फ़ॉलोअर
मंगलवार, 13 अक्टूबर 2020
बुधवार, 23 सितंबर 2020
कुण्डलिया
चिड़िया भूखी मर रहीं, मौज मनाते मोर,
चौकीदारी जो करें, खुद ही बनता चोर ;
खुद ही बनता चोर , मोर को खूब चुगाता,
छोटी-छोटी चिड़ियाओं को खूब सताता ;
कर भारत में वास , सूंघ जादू की पुड़िया,
बन जायेगा मोर , भले कोई हो चिड़िया ।
गुरुवार, 17 सितंबर 2020
कुण्डलिया
भाग्य भरोसे छोड़ कर, दें कुयें में डाल,
जोड़ी जब मिलती नहीं, हर दिन कटे बवाल;
हर दिन कटे बवाल , मौन रह कर सह जाती,
मन की बात किसी के सम्मुख न कह पाती ;
कर दहिया में वास, सभी को दिखा सौभाग्य,
मन में विचलन रोज, यही है अपना भाग्य ।
रविवार, 13 सितंबर 2020
कुण्डलिया
सच को खोजन जब चली, मिली झूठ पर झूठ,
सबसे नीचे सच दबी, नित नित चढ़ती झूठ ;
नित नित चढ़ती झूठ , झूठ नाचे इठलाये,
खेंच रही सच सांस , झूठ तो खुशी मनाये ;
कर दहिया में वास गुजारा करना सचमुच,
हो जाता अपमान यहां जो बोलेगा सच ।
रविवार, 23 अगस्त 2020
कुण्डलिया
पहले हम गांधी बने, लेकर चरखा हाथ,
पुनः हजामत छोड़ कर, बने रवीन्द्र नाथ;
बने रवीन्द्र नाथ, अभी हम मोर चुगाते,
फूटी जिनकी आंख, प्रशंसा उनसे पाते;
कर दहिया में वास, काम बुद्धि से ले ले,
डिजिटल नकली चित्र, बहुत देखे हैं पहले ।
शनिवार, 22 अगस्त 2020
कुण्डलिया
तन और मन का जोड़ कर, दे कुदरत से जोड़,
सच मानों हे मानुषा, होगा तू बेजोड़;
होगा तू बेजोड़, कष्ट सब दूर हटेगा ;
बन जाये समभाव, कष्ट सब आप कटेगा;
कर दहिया में वास , अगर जाता दोहरापन,
अध्यात्म की राह , जुड़े कुदरत से मन-तन ।
मंगलवार, 18 अगस्त 2020
कुण्डलिया
लोक तंत्र को कर रहे, नेता आज हलाल,
लोक खड़ा हो देखता, करता नहीं मलाल;
करता नहीं मलाल, पेट की चिंता भारी ,
छूट चुके सब काम, लोक की यह लाचारी;
बुद्धि जीवी कर रहे , देख देख कर शोक,
मुट्ठी भर ही शेष हैं, शेष यहां सब लोक ।
शनिवार, 15 अगस्त 2020
कुण्डलिया
नियति ने कोमल रची, यह नारी की जात ,
तन से भी कोमल बने, मन के सब जज्बात;
मन के सब जज्बात , सहारा इसको चाहता,
वरना कठिन कठोर समय इस पर छा जाता;
कर दहिया में वास, पुरुष से बने सुगति ,
वरना रहती नहीं नार की अपनी नियति ।
बुधवार, 5 अगस्त 2020
कुण्डलिया
बाल्मिक ने रच दिया, एक सुंदर सा काव्य;
भाव लोककल्याण का, चरित एक सम्भाव्य;
चरित एक सम्भाव्य पथिक उत्तम मार्ग का;
राज-समाज सब त्याग, करे हित जो सब ही का;
तुलसी ने अपने समय, लिख दिया राम चरित ;
कवि कल्पना छंद कथा, रामायण बाल्मिक।
शनिवार, 1 अगस्त 2020
कुण्डलीयां
सबला बनने की ललक , कैसा चढ़ा बुखार;
पूरक बन पैदा हुए, दुनियावीं व्यवहार ;
दुनियावीं व्यवहार, कर्म दोनों का न्यारा;
कर्म किए बिना नहीं यहां चल सकता चारा;
कर दहिया में वास, नहीं रह पाये अबला;
मिले पति का प्यार जिसे, वह खुद ही सबला ।
मातृशक्ति सशक्त हो, बात चली यह खूब;
हर नुक्कड़ हर चौंक पर, मची हुई है धूम;
मची हुई है धूम, नहीं अबला रह पाये;
सम्भवतः यह शब्द कोष से ही मिट जाये;
कर दहिया में वास, फिरेगी नर की दृष्टि;
बस तब सबला बन पायेगी मातृशक्ति ।
सदस्यता लें
संदेश (Atom)
कुण्डलिया
खेतिहर ने रच दिया, एक नया इतिहास, एक एकता बन चुकी, मिलकर करें विकास; मिलकर करें विकास, नहीं मजदूर बनेंगे, अपनी भूमि पर, इच्छा से काश्त करेंग...